पटना की सड़कों पर उतरी कांग्रेस
पटना में युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने नीतीश सरकार के खिलाफ ज़ोरदार प्रदर्शन किया। उनका आरोप है कि सरकार ने भोगलपुर जिले के पिरपैंती क्षेत्र में अडानी ग्रुप को मात्र 1 रुपये प्रति एकड़ की दर से करीब 1,053 एकड़ जमीन सौंप दी। कार्यकर्ताओं का कहना था कि यह सीधे-सीधे जनता और किसानों के हितों के खिलाफ है।
कांग्रेस का आरोप
कांग्रेस का कहना है कि इस सौदे में हजारों किसानों की ज़मीन और लाखों फलदार पेड़ों की अनदेखी की गई है। ज़मीन का असली बाज़ार मूल्य करोड़ों में है, लेकिन प्रतीकात्मक किराए पर देने से सरकार ने उद्योगपतियों को फायदा पहुँचाया और राज्य को नुकसान उठाना पड़ा।
सरकार का पक्ष
बिहार सरकार का कहना है कि अडानी पावर प्रोजेक्ट से राज्य में औद्योगिक निवेश और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। सरकार के अनुसार, परियोजना से मिलने वाली बिजली राज्य की ज़रूरतें पूरी करेगी और जमीन का आवंटन नियमों के तहत किया गया है।
क्या यह पहली बार है?
यह पहली बार नहीं है जब कम कीमत पर जमीन आवंटन को लेकर विवाद हुआ हो। भारत में कई बार विभिन्न सरकारें (कांग्रेस और अन्य दलों की) बड़े प्रोजेक्ट्स और उद्योगों को आकर्षित करने के लिए “प्रतीकात्मक दरों” पर जमीन देती रही हैं।
कुछ प्रमुख उदाहरण:
हरियाणा (गुड़गांव-मानेसर प्रकरण): यहाँ किसानों से अधिग्रहित ज़मीन को बिल्डरों को कम दाम पर देने का आरोप लगा। बाद में अदालतों ने कई सौदे रद्द कर दिए।
रॉबर्ट वाड्रा-डीएलएफ केस (हरियाणा): भूमि उपयोग परिवर्तन (Change of Land Use) के नियमों में ढील देकर बेहद सस्ते मूल्य पर बड़े भूखंड दिए गए थे।
महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश: कई बिजली संयंत्रों और विशेष औद्योगिक क्षेत्रों (SEZ) के लिए कंपनियों को ज़मीन नाममात्र कीमतों पर दी गई।
इस नीति की जड़ कहाँ है?
भारत में औद्योगिक विकास और निवेश आकर्षित करने के लिए जमीन कम दर पर देने की प्रथा कई दशक पहले शुरू हुई।
1970 और 1980 के दशक में कांग्रेस सरकारों ने “लैंड पूलिंग” और “सस्ते लीज़” की नीतियाँ लागू की थीं, ताकि कारखाने, स्टील प्लांट और पब्लिक सेक्टर कंपनियाँ बन सकें।
बाद में निजीकरण और उदारीकरण (1991 के बाद) के दौर में यही नीति निजी कंपनियों को भी लागू कर दी गई। राज्यों को निवेश आकर्षित करने के लिए “विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ)” और “औद्योगिक पार्क” योजनाएँ शुरू करनी पड़ीं।
इन योजनाओं में ज़मीन का मूल्य अक्सर बहुत कम रखा जाता है ताकि निवेशक आकर्षित हों। लेकिन यही नीति अब विवाद का कारण बन रही है क्योंकि जनता का मानना है कि सरकारें किसानों और पर्यावरण के हितों की अनदेखी कर रही हैं।
निष्कर्ष
बिहार का यह मामला दिखाता है कि भारत में जमीन आवंटन की पारदर्शिता हमेशा सवालों के घेरे में रही है।
एक ओर सरकारें कहती हैं कि उद्योग आने से रोजगार और विकास होगा।
दूसरी ओर विपक्ष और जनता सवाल उठाते हैं कि जब ज़मीन कौड़ियों के भाव दी जाती है, तो असली लाभ किसे होता है — जनता को या उद्योगपतियों को?
कांग्रेस और कम कीमत पर ज़मीन आवंटन: आज़ादी से अब तक
- आज़ादी के बाद का दौर (1947–1960)
आज़ादी के तुरंत बाद कांग्रेस की सरकार ने औद्योगिकरण को बढ़ावा देने के लिए पब्लिक सेक्टर यूनिट्स (PSU) और बड़े उद्योगपतियों (टाटा, बिरला आदि) को सस्ती ज़मीन दी।
स्टील अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया (SAIL), भिलाई, बोकारो, राउरकेला प्लांट जैसी इकाइयों के लिए बड़ी मात्रा में ज़मीन किसानों और आदिवासियों से अधिग्रहित कर नाममात्र कीमत पर दी गई।
कांग्रेस का तर्क था कि उद्योग से रोज़गार और बुनियादी ढाँचे का विकास होगा।
- हरित क्रांति और औद्योगिक विस्तार (1960–1980)
1960 और 1970 के दशक में कांग्रेस सरकारों ने कई उर्वरक कारखाने, कोयला और बिजली प्रोजेक्ट्स के लिए ज़मीन ली और कंपनियों को बेहद सस्ती दरों पर दी।
टाटा स्टील, टाटा मोटर्स (जमशेदपुर) को लगातार रियायती दरों पर भूमि मिलती रही।
इस दौर में “भूमि अधिग्रहण कानून 1894” का दुरुपयोग हुआ। किसानों से कम मुआवज़े पर ज़मीन लेकर उसे उद्योगों को कौड़ियों के भाव दिया गया।
- इंदिरा गांधी और लाइसेंस राज (1970–1984)
लाइसेंस-परमिट राज के चलते हर उद्योगपति को प्रोजेक्ट के लिए सरकार की मंज़ूरी और सस्ती ज़मीन मिलती थी।
सार्वजनिक क्षेत्र (PSU) को प्राथमिकता थी, लेकिन निजी कंपनियों को भी “लीज़” पर ज़मीन दी गई।
इस समय “औद्योगिक विकास निगम” (Industrial Development Corporations) बने, जो ज़मीन खरीदकर बहुत सस्ते प्लॉट्स में उद्योगपतियों को बाँटते थे।
- राजीव गांधी युग और प्राइवेट सेक्टर की वापसी (1984–1991)
कंप्यूटर, टेक्नोलॉजी और इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा देने के लिए निजी कंपनियों को शहरों के पास आईटी पार्क, औद्योगिक पार्क बनाने हेतु ज़मीन कम कीमत पर मिली।
महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में कई आईटी कंपनियों को ज़मीन सस्ती दरों पर दी गई।
- आर्थिक उदारीकरण (1991–2004)
पी.वी. नरसिम्हा राव और बाद में मनमोहन सिंह (वित्त मंत्री) ने लिबरलाइजेशन, प्राइवेटाइजेशन और ग्लोबलाइजेशन (LPG नीति) शुरू की।
इस दौरान विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) नीति लाई गई, जिसके तहत बड़े उद्योगपतियों को कई हज़ार एकड़ ज़मीन बेहद कम दरों पर दी गई।
कांग्रेस शासित राज्यों (आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक) में उद्योगपतियों को आकर्षित करने के लिए ज़मीन सस्ते में लीज़ पर दी गई।
- यूपीए सरकार (2004–2014)
यूपीए सरकार ने SEZ एक्ट, 2005 लागू किया।
इसके तहत रिलायंस, अदानी, टाटा, एस्सार जैसी कंपनियों को देशभर में हज़ारों एकड़ ज़मीन रियायती दरों पर दी गई।
नंदीग्राम (प. बंगाल, 2007) और सिंगूर (2006) का आंदोलन इसी नीति के खिलाफ था।
सिंगूर में टाटा नैनो प्रोजेक्ट को कम कीमत पर ज़मीन दी गई, लेकिन जनता के विरोध के कारण टाटा को प्रोजेक्ट गुजरात ले जाना पड़ा।
नंदीग्राम में किसानों ने ज़मीन देने से मना किया और आंदोलन हुआ, जिससे कई लोगों की जान गई।
- हालिया कांग्रेस सरकारें (2014–आज तक, जहाँ कांग्रेस सत्ता में रही)
छत्तीसगढ़, राजस्थान और कर्नाटक जैसी जगहों पर कांग्रेस सरकारों ने बिजली संयंत्र, सीमेंट फैक्ट्री और आईटी पार्क के लिए कंपनियों को ज़मीन बाजार दर से बहुत कम कीमत पर दी।
हालांकि भाजपा और अन्य दलों के शासनकाल में भी यही नीति जारी रही, इसलिए अब यह दोनों दलों पर आरोप के रूप में लगाया जाता है।
मुख्य बिंदु
- कांग्रेस ने ज़मीन सस्ते में देने की परंपरा की शुरुआत की – औद्योगिकीकरण और निवेश बढ़ाने के नाम पर।
- PSU से लेकर प्राइवेट कंपनियों तक – कांग्रेस ने दोनों को कम कीमत पर ज़मीन उपलब्ध कराई।
- SEZ नीति (2005) – कांग्रेस सरकार का सबसे बड़ा कदम, जिसने बड़े उद्योगपतियों को हज़ारों एकड़ ज़मीन लगभग मुफ्त में दी।
- विवाद और आंदोलन – सिंगूर, नंदीग्राम जैसे आंदोलन कांग्रेस की ज़मीन नीति के खिलाफ हुए।
👉 यानी, आज़ादी से लेकर अब तक कांग्रेस का रिकॉर्ड यह दिखाता है कि उसने औद्योगिक विकास के नाम पर कई बार उद्योगपतियों को कम कीमत पर ज़मीन दी, चाहे वो टाटा हों, बिरला हों, रिलायंस हो या अदानी-एस्सार।
